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24 अक्तूबर 2010

कविता

कुछ बोलो तो .......

कुछ बोलो तो कि क्या भला करते?
जो भी करसकते थे वो किया हमने , 
एक अंधेरे से  बारजे पर चढ़ कर ,
प्यार का दीप धर दिया हमने //


जिंदगी  सिर्फ और सिर्फ हंसी ,
जिसमे है आंसुओं का गीलापन ,
जिसके आंगन मे है जवानी भी ,
जिसके द्वारे पे खेलता बचपन //


थोडा बढ़ता तो ताप होता मैं ,
नीचे गिरता तो श्राप होता मैं ,
चलते चलते नहीं थका अब भी ,
और बढ़ता तो आप होता मैं //


मैंने रिश्तों को किताबों की तरह ,
यक्ष प्रश्नों के जवाबों की तरह ,
सबसे जो भी मिला लिया हमने ,
जीता आया हूं फिरभी नवाबों की तरह //


मुझसे कहते तो और कुछ करता ,
सामने अपने इक आइना रखता ,
जोड़ बाकी नहीं पता मुझको ,
कैसे खुद में खुद का गुणा करता ,,                                    


मेरी बाँहों को थाम तो लेना ,
कभी तन्हाई मे नाम भी लेना ,
मेरे हमदम ,मेरे साथी ,मेरे महबूब मेरे ,
अपने लफ्जों से काम तो लेना //

5 टिप्पणियाँ:

  1. बधाई !

    सभी मुक्तक उत्तम

    सभी मुक्तक पठनीय

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. बेनामीOct 25, 2010 06:48 AM

    मेरी बाँहों को थाम तो लेना ,
    कभी तन्हाई मे नाम भी लेना ,
    मेरे हमदम ,मेरे साथी ,मेरे महबूब मेरे ,
    अपने लफ्जों से काम तो लेना ....
    क्या बात है सर...
    मुम्बई कब जा रहे हैं...

    क्या बात है....

    चन्दर मेहेर

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. http://vijaymadhur.blogspot.com/Oct 28, 2010 09:30 AM

    saaree rachnaayain dil ko chho lene walee hain....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. http://vijaymadhur.blogspot.com/Oct 28, 2010 09:31 AM

    bahut achhee rachnaayain

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं