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15 फरवरी 2011

ग़ज़ल

जाने क्यों जीवन में शेष बस उदासी है ?
मुस्कानें ग़ायब हैं ,जेब में उबासी है //
रूठने मनाने के झूठे सब नाटक हैं /
भूख बहुत ज्यादा है ,प्यास बहुत प्यासी है //
भूल रहे सपने हैं ,यादें हैं थकी-थकी /
पीडाएं ताज़ी हैं गीत सभी बासी हैं //
एक सी कहानी है,एक जैसे क़िस्से हैं /
गुदगुदी ये बचपन की बाकी जरा सी है //
अंधों की दुनिया पर गीत सब उजालों के /
लगता है दोपहरी शामों की दासी है //

4 टिप्पणियाँ:

  1. अंधों की दुनिया पर गीत सब उजालों के ,
    लगता है दोपहरी शामों की दासी है ।

    वाह, इस शेर का बिम्ब विधान अद्भुत है।
    बढ़िया ग़ज़ल।
    ...बधाई, डॉ. साहब।

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  2. अच्छा लिखा है आपने, आपका ब्लॉग "अपना ब्लॉग" में सम्मिलित कर लिया गया है अधिक जानकारी के लिए http://www.apnablog.co.in को विजिट कीजिए

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  3. क्या कहूं, आप सबको पढ़ते हुए ही लिख रहा हूँ...बस!
    बहुत सुन्दर रचना रची है आपने! बस यूं ही जारी रहें.
    --
    व्यस्त हूँ इन दिनों-विजिट करें

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