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28 अप्रैल 2011

लिखता हूँ मैं

लिखता हूँ मैं ,दिखता हूँ मैं ,
टुकड़ों -टुकड़ों बिकता हूँ मैं ,
फिर भी छोड़ कहाँ जाऊं सब ?
इस माटी की सिकता हूँ मैं //
ओढ़ भ्रमों का चोला-बाना,
खुद-खुद से रह गया अजाना ,
भले रहा नन्हा सा तिनका ,
तूफानों में टिकता हूँ मैं //
ऊब गया पर जूझ रहा हूँ ,
कठिन पहेली बूझ रहा हूँ ,
बार-बार अपने अंधियारे ,
उजियारों सा लिखता हूँ मैं//
रचता रहा युगों से अबतक ,
मैं एकाकी इस धरती पर ,
इसी लिए इस निर्मम रन में ,
जैसा हूँ वैसा दिखता हूँ//

9 टिप्पणियाँ:

  1. खुबसूरत रचना ,दिल कहा वाह .....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. इसी लिए इस निर्मम रन में ,
    जैसा हूँ वैसा दिखता हूँ

    गहन अभिव्यक्ति.....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर नये प्रतीकों वाली सुन्दर रचना । बधाई ।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. बार बार अपने अन्धियारे. ,उजियारों सा लिखता हूँ ,छोटी बहर की अच्छी ग़ज़ल.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  6. होने, लिखने और दिखने की बात पर भवानी भाई बरबस याद आ जाते हैं.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  7. लिखता हूँ मैं ,दिखता हूँ मैं ,टुकड़ों -टुकड़ों बिकता हूँ मैं ,
    फिर भी छोड़ कहाँ जाऊं सब ?इस माटी की सिकता हूँ मैं
    ...waah! bahut khoob!

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं