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27 नवंबर 2013

ग़ज़ल

ग़ज़ल



शब्द नहीं हैं,अर्थ नहीं हैं ,लय का है भारी टोटा /
सच मे कहिये,क्या करियेगा ,जब अपना सिक्का खोटा//
भूखे ,नंगे,मजलूमों ने तो अपना कर्त्तव्य किया /
हम मे चाल ,चरित्र नहीं है ,यही बताता है नोटा//
अपनी सुविधाओं से गढ़ कर लोकतंत्र के अर्थ नए /
घूम रहे हैं इधर उधर ,जैसे बिन पेंदी का लोटा //
बड़े-बड़े चेहरों के भीतर कितनी कालिख पुती हुई /
बडे यहाँ पर बडे नहीं हैं लेकिन छोटा है छोटा //
सम्राटों के लिए सदा बलि होते हैं भूखे नंगे /
संगीनों के पहरे मे अब ,राजसूय करते होता //

25 जून 2013

गीत 

मेरी चीख सुनेगा कौन?
मैं तो बादल सा आवारा ,
गाँव शहर की गलियों गलियों ,
फिरता हूँ पागल ,नाकारा ,
मुझको लेकर उम्मीदों के सुंदर स्वप्न बुनेगा  कौन?
इस जीवन के चन्दन वन में 
,कदम कदम पर सर्प मिले,
अपनों को ही डंसने वाले ,
अपनों के ही दर्प मिले ,
अंधियारों को उजियारों का नेता रोज चुनेगा कौन?
गोरा बदन ,चमकती पायल,
आँखों मे तीखा तीखा पन 
,कठिन,कटीली चूनर में भी  
दीखता है यह नटखट बचपन ,
उन्मादों की मदिर कौंध में ,मीठे गीत बुनेगा  कौन  ? 
धूप धूप  सी रही नहीं है ,
कोहरे का है राज बड़ा 
,सत्य गली में झाड़ू देता  ,
राजमहल में पाप खड़ा ,
ऐसे में अब पाप पुण्य के नाटक नए सुनेगा कौन?
मेरी चीख सुनेगा कौन?

29 जनवरी 2013

ग़ज़ल

टूटता है मन,मनोबल टूटता है/
कोई अपना जब अचानक रूठता है //
दर्द का सागर सुनामी पालता है /
अभिव्यक्ति का ज्वालामुखी जब फूटता है //
दूर तक देखें कहाँ है ताब किसकी/
आजकल रहबर ही घर को लूटता है//
\रेल के पहियों सरीखी ज़िंदगी है /
प्लेट फोर्म पर सिफ़र ही छूटता है//
यह अज़ब अनुभूति है अपनी कथा की/
खुद ही जो खोया उसी को ढूँढता है//

बात की बात में ............................................

बात की बात में कहानी लिख /
उम्र को दर्द की जवानी लिख //
मां  ने पाला  जिसे तपस्या से /
उसी बचपन को अब जवानी लिख//
आग से कैसे बचे अब बस्ती?
ऐसी कुछधूल ,रेत  ,पानी लिख//
लोग खंजर लिए हुए हैं मन में/
उन्ही के रहमोकरम लिख ,तू राजधानी लिख //
जो पैर पेट में दे सोते हैं आसमां के तले /
कि उनके दर्द की तल्खी तू आनी जानी लिख //
अगर तू चाहता है कि ये आबो हवा साफ़ रहें /
तू मेरे,सूर,और कबीर जैसी बानी लिख//

ग़ज़ल 

टूटे मन से और बहुत भी टूटा हूँ/
औरों को क्या कहूं जो खुद ही झूठा हूँ//
जग में कितने अपनों को दी पीडाएं /
औरों से ठोकर खाई तो रूठा हूँ//
संगम की रेती पर पर चल जीवन काटा /
पर अब लगता है बगलोलों  का फूफा हूँ//
इतना हम से कभी पूछ तो लेते तुम/
इतना लूटी दुनिया फिर क्यों भूखा हूँ ?
सबके आगे आगे दौड़ा जीवन भर  /
पर अब लगता है सबसे पीछे छूटा हूँ //