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2 फरवरी 2012

आप

आप फिर याद आने लगे हैं/
जख्म फिर मुस्कुराने लगें हैं //
धुप की बढ़ रही है तपिश /
फूल फिर गुनगुनाने लगें हैं //
उम्र ज्यों होगई आइना /
अक्स खुद को डराने लगे हैं//
जान बक्शी की किस से अरज ?
दोस्त छूरे चलाने लगे हैं//
मुद्दतों बाद देखा है घर /
पर नयन डबदबाने लगे हैं //
किस से मन की कहें दास्ताँ ?
दर्द फिरसर उठाने लगे हैं //

10 नवम्बर 2011

दीवाली के जगमग दिए ,

दीवाली के जगमग दिए ,
जीवन को रोशन कर जाएँ ,
जो कुछ भी अब तक मिला नहीं ,
वह सबकुछ अब जीवन में पायें ,
निर्मल हो मन ,तन स्वस्थ रहे ,
हरपग पर नए उजाले हों ,
कितने तूफ़ान चलें फिर भी
सौ दीप जलाने वाले हों //



दीवाली मंगलमय हो बंधु जन सपरिवार आप सभी को
सस्नेह !

25 अक्तूबर 2011

मन

मन खो गया है यह तन  खो गया है ,
तुमको दिया हर वचन खो गया है //
     उदासी की शामों में खोई हैं रातें ,
ज़माने की सरगोशियों  की हैं बातें ,
ज़वानी का सब जोश भी खो गया है //
उलझे सितारों की उलझी कहानी ,
हँसे जा रहीं हैं ये किरणों की रानी ,
मुस्कराहट भरा हर नयन खो गया है //
उम्मीदों से कितने दिए जल सकेंगे?
मरुथल में कितने जो संग चल सकेंगे ?
तुम्हारे  संग रहने  का भ्रम खो गया है //
हर ख़ुशी में कहीं दुःख भी जी रहा है ,
ये मन ही है सारा ज़हर पी रहा है ,
बस ,तुम्हारे चरण पर नमन खो गया है//
  

15 सितम्बर 2011

आज एक ताज़ी कविता

-

पहचान ले जो जिंदगी ,वो नजर कहाँ से  लाऊं ?                                   
ये है आंसुओं की मंडी,यहाँ कैसे मुस्कराऊँ ?
ये दबी -दबी सी आहें ,उफ़ ,ये नजर का कुहासा ,
जहाँ ग़म के सिलसिले हैं वहां कैसे गुनगुनाऊँ ,
यहाँ भूख का सफ़र है ,वहां रोशनी का जलवा ,
जहाँ इत्र उड़  रहा हो वहां प्यास क्या बुझाऊँ ,
हर एक खुश है यारों ,चलो बच गयी है इज्जत ,
इस रोशनी के आँसू तुम्हें मीत क्या दिखाऊँ ,
फुटपाथ पे जो बूढा अभी बिन रहा था टुकड़े ,
पहियों तले बिछा है,उसे बोलो कहाँ लिटाऊ,
मेरे देश चुप हो  कैसे ,कुछ बोलते नहीं क्यों?
सदियों रहा हूं भूखा ,कैसे वजन  उठाऊँ //

28 अगस्त 2011



अन्ना जी के लिए ............

जब जुल्म की ताकत टूटेगी ,जब ताज धरा पर आएगा ,
जब सच का सूरज चमकेगा ,जब हर जर्रा मुस्काएगा ,
जब कोटि-कोटि जन सड़कों पर खुद ही आकर छा जायेंगे ,
तब तुम्हे नमन करने को जग के सब मस्तक झुक जायेंगे

जब इन रोशन दीवारों पर सच नयी इबारत लिक्खेगा ,
तब ताप समय के सूरज का सच्चाई जैसा दिक्खेगा ,
फिर एक ज्वार सा जनता का यूं नया उभर कर आएगा,
ले नयी मशालें साहस की,हर बूढा बच्चा गायेगा ,

इस घोर तिमिर के आँगन में ,दिनमान नया उग आएगा
यह कथा सत्य के साहस की युग युग-युग तक दोहराएगा ,
हर राह ,गली ,चौबारे पर जब जन अपना मन खोलेगा ,
हर पर्वत ,नदी,वृक्ष ,पत्ता तक अन्ना-अन्ना बोलेगा ,
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