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खुशबू के शिलालेख

तुम खुशबू के शिलालेख हो ,
मै हूं सागर की गहराई,
तुम हो दिव्य कामना मन की 
मैं हूं तेरी ही  परछाईं //
तेरे दुःख के सारे किस्से ,
लगते हैं क्यों अपने हिस्से ?
ये सब बातें अंतर्मन की,
बोलो कहें यहाँ किस किस से ?//
जितना सोचा उतना डूबे ,
लगते हैं अब  जग से ऊबे ,
माँगा बहुत, न पाया कुछ भी ,
प्रीत रीति के खेल अजूबे //
धरती भारी,जग व्यापारी ,
जीते जाना है लाचारी ,
सबसे जो  जीती थी रण में ,
वही शख्शियत  घर में  हारी,//
यशी कथा हरदम चलती है ,
मुस्का कर खुद को छलती  है,
इस अंधियारे कालखंड में ,
दीये सा हरदम जलती है // 








,

6 टिप्‍पणियां:

  1. धरती भारी,जग व्यापारी ,
    जीते जाना है लाचारी ,

    Wonderful creation !

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  2. मंगलवार 13 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. तेरे दुःख के सारे किस्से ,
    लगते हैं क्यों अपने हिस्से ?
    ये सब बातें अंतर्मन की,
    बोलो कहें यहाँ किस किस से ?//


    wah ji wah kya marmik bhaav ko shabd diye hai ...exceelent creation
    sundar saral saargarbhit

    उत्तर देंहटाएं
  4. तेरे दुःख के सारे किस्से ,
    लगते हैं क्यों अपने हिस्से ?
    ये सब बातें अंतर्मन की,
    बोलो कहें यहाँ किस किस से ?//

    बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति और क्या खूबसूरत शब्द सयोंजन है

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेहद प्रभावशाली और सार्थक, इकदम हक़ीक़ी को उतारा है जोया. सर, और क्या कहूं! पढ़कर मजा आ गया. बस और लिखिए कि फिर पढ़ें कोई जुबां अपनी सी.
    आभार.

    उत्तर देंहटाएं

© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.