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गीत 

मेरी चीख सुनेगा कौन?
मैं तो बादल सा आवारा ,
गाँव शहर की गलियों गलियों ,
फिरता हूँ पागल ,नाकारा ,
मुझको लेकर उम्मीदों के सुंदर स्वप्न बुनेगा  कौन?
इस जीवन के चन्दन वन में 
,कदम कदम पर सर्प मिले,
अपनों को ही डंसने वाले ,
अपनों के ही दर्प मिले ,
अंधियारों को उजियारों का नेता रोज चुनेगा कौन?
गोरा बदन ,चमकती पायल,
आँखों मे तीखा तीखा पन 
,कठिन,कटीली चूनर में भी  
दीखता है यह नटखट बचपन ,
उन्मादों की मदिर कौंध में ,मीठे गीत बुनेगा  कौन  ? 
धूप धूप  सी रही नहीं है ,
कोहरे का है राज बड़ा 
,सत्य गली में झाड़ू देता  ,
राजमहल में पाप खड़ा ,
ऐसे में अब पाप पुण्य के नाटक नए सुनेगा कौन?
मेरी चीख सुनेगा कौन?

3 टिप्‍पणियां:

  1. आज के माहोल पे सटीक टीका है ये रचना ... बहुत खूब ...

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  2. वर्तमान स्थिति का आईना दिखती सार्थक रचना...शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं

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