यह ब्लॉग खोजें

लोड हो रहा है. . .

12 जून 2011

एक ग़ज़ल

होश में आगया हूँ इधर/
खुद की करने लगा हूँ कदर //
मिल गयी इतनी ज्यादा ख़ुशी /
डबदबाने लगी है नज़र//
रात तकियों ही तकियों कटी /
बज रहा है सुबह का गज़र //
जिनको पूजा था बुत मान कर /
उनसे ही लग रहा आज डर//
रण में कूदे ही जिनके लिए /
शास्त्र लेकर भगे वे ही घर //
उम्र भर जिनपे चलते रहे/
अजनबी क्यों लगीं रहगुज़र?//

11 टिप्पणियाँ:

  1. उम्र भर जिनपे चलते रहे,
    अजनबी क्यों लगीं रहगुज़र|
    खुबसूरत ग़ज़ल मुबारक हो ....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. डबदबाने! टंकण त्रुटि सुधार दीजिए। हर शेर के दरमियां खाली स्थान छोड़ दीजिए।
    ....बहुत अच्छी गज़ल है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. वह बहुत अच्छी रचना है ! मज्जा आ गया !मेरे ब्लॉग पर अपना सहयोग दे !
    Latest Music
    Latest Movies

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. खूबसूरत गज़ल ...

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. भूपेंद्र जी,
    आपकी होश में लाने वाली रचना अच्छी लगी!

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  6. बेनामीAug 8, 2011 01:36 AM

    badhiya gajal hai ase hi likhte rhiy

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं