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गीत

दिन बहुत बीते, नहीं अब याद मुझ को गीत पहला //
रागिनी सी उम्र थी और प्यार था संतूर सा
अश्रु कण भी नहीं थे और दर्द भी था दूर सा
जी रहा था पुष्प सा ,मधुगंध सी थीं तुम प्रिये
रूप की इस धूप में हर हर शक्श था मजबूर सा ,
आज भी है याद मुझको बात पहली ,प्यार पहला //
क्या करूँ संघर्ष ही हरदम रहा है साथ मेरे
वक़्त की तन्हाइयां हों या उजालों के सवेरे ,
हारने की,जीतने की बात मै करता नहीं हूँ ,
लग रहा है छल रहे हैं उम्र को मन के अँधेरे ,
चाहता हूँ अब छोड़ ही दूं प्रीति का अधिकार पहला //
मैं थका हूँ पर अभी भी जूझने की चाह बाकी
उम्र भर चलता रहा हूँ पर अभी भी राह बाकी
ताप है मेरी शिराओं में कि अब भी शेष है रण,
मुस्कराहट है लबों पर, है हृदय में आह बाकी
कर रहा अंतिम पलों में हार का स्वीकार पहला //

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उम्दा..लाईन ब्रेक पर एन्टर दबाईये न!!

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  2. प्रिय अनुज ,प्रेम गीत लिखने में इतनी गहराई कहाँ से लाते हो ? किस किस पंक्ति का ज़िक्र करुँ,समझ नहीं पा रहा हूँ ! बहुत ही मार्मिक गीत लिखा है आपने ,निश्चय ही आप प्रशंसा के पात्र हैं इस मनभावन रचना के लिए !

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  3. मुस्कराहट है लबों पर, है हृदय में आह बाकी
    कर रहा अंतिम पलों में हार का स्वीकार पहला ..dil se nikle ahsaas hai aapke....

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  4. मैं थका हूँ पर अभी भी जूझने की चाह बाकी
    उम्र भर चलता रहा हूँ पर अभी भी राह बाकी

    pyaar ke saath jijeevisha ka yah ahsaas adbhut hai. likhte rahiye. badhai.

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  5. मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! अब तो मैं आपका दसवी फोल्लोवेर बन गई हूँ इसलिए आती रहूंगी! मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

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© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.