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मन अनमना

अनमना है मन ,पता चलता नही ।
पीर का लोहा सहज गलता नही //
आश्वासन है मशालों के यहाँ /
कोई दिया देहरी पर जलता नहीं /
कैसी फितरत है कि चुप रहता नहीं /
आदमी कैसा है कुछ कहता नहीं /
ताल्लुकों के तार सब टूटे हुए /
अब कोई चल उम्र को चलता नहीं /
एक जंगल है उदासी का यहाँ /
कोई सपना प्यार का पलता नहीं /

2 टिप्‍पणियां:

  1. अनमना है मन ,पता चलता नही ।
    पीर का लोहा सहज गलता नही //
    कहाँ कहाँ से दर्द समेट लेते हो भाई ! बहुत मार्मिक है , आपकी पीर दूसरों को पिघला देती है !ऑरकुट पर भी एक खता खोल लो !बात करने में आसानी रहेगी !आज ही यह काम करें !

    उत्तर देंहटाएं
  2. कहाँ गायब हो गए हो भाई !अचानक इतनी चुप्पी अच्छी नहीं !रचना के इंतजार में !

    उत्तर देंहटाएं

© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.