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गीत..............................................

एक पल है किजो बिखरता है,
एक पल है कि जो सम्हलता है ,
एक तुम हो जो हमारे मन मे  ,
सच मे तुम मे बहुत तरलता है ,


अब भी खुशबू के गीत सी तुम हो ,
उम्र की हार जीत सी तुम हो    ,
रोशनी का हो कौंधता सा पल ,
सच मे संकट के मीत सी तुम हो ,


शब्द हो ,गीत हो ,उजाला हो ,
जिसको सूरज ने खुद ही पाला हो
मेरे माथे की लकीरें हो तुम ,
मेरे पावो मे पड़ा छाला हो ,


मेरी अनुभूति की शिला पर भी,
तुमने खुद को अमिट बना डाला,
पीर के द्वार पर लगा डाला ,
अपने संकल्प का  सुदृढ़ ताला ,


तुमसे क्या कुछ कहूँ सुमुखि बोलो?
 चाह कर भी नही कहूँगा मैं ,
तुमने खुद ही मेरी कथा कह दी ,
पहले जैसा ही चुप रहूँगा मैं  ,
 

7 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर !जिसे प्रेम किया जा एवह aस्बकुhच हो जाता है,पैर का छाला भी।

    घुघूती बासूती

    उत्तर देंहटाएं
  2. मेरे पावो मे पड़ा छाला हो .. behtareen pankti.

    उत्तर देंहटाएं
  3. अब भी खुशबू के गीत सी तुम हो ,
    उम्र की हार जीत सी तुम हो ,
    रोशनी का हो कौंधता सा पल ,
    सच मे संकट के मीत सी तुम हो ,


    बहुत सुंदर.......!!

    उत्तर देंहटाएं

© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.