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तुम

एक सागर है,
और जिसमे तुम ,
उम्र की खामोशियों में ,
होरही हो गुम    /
दूर तम भी और ,
गहरा हो रहा है ,
उम्र पर पाबंदियों का और 
पहरा हो रहा है ,

मुट्ठी यों से वक़्त की वक्त की यह ,
रेत छनती जा रही है,
शाम पर तन्हाइयों की 
एक बदली छा रही है ,

मैं कहाँ हूं तुम कहाँ हो,
बीच बाकी मौन भारी  ,
रूप के अंधे कुओं पर ,
जिंदगी का जोश तारी ,

गीत कितने गा चुका हूँ ,
और कितना गा रहा हूँ,
मीत ,तुमको दूर अपने से ,
बहुत क्यों पा रहा हूँ?

शाम का लंबा सफ़र है ,
थक रहे हैं पाव मेरे  
याद की दहलीज़ पर ,
ठिठके हुए है स्याह घेरे//

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैं कहाँ हूं तुम कहाँ हो,
    बीच बाकी मौन भारी ,
    रूप के अंधे कुओं पर ,
    जिंदगी का जोश तारी ,

    beautiful poetry...i like these lines very much.

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह भूपेन्‍द्र जी बहुत अच्छा रचा है।

    उत्तर देंहटाएं

© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.