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चाहे घर जाओ या वन जाओ ,
तुम झुको कि या फिर तन जाओ ,
चाहे छाया बन कर फिरो कहीं ,
या मन का दर्पण बन जाओ ,
आंसू बन आँखों की देहरी ,
अगवानी हो इन सांसों की,
झंझावातों में जीवन के ,
क्या रिक्ति शेष परिहासों की ?
उजला उजला सब दीख रहा पर ,
पर बहुत शेष है कालापन ,
चेहरे पर चेहरे लगे हुए ,
कब तक सच बोलेगा दर्पण ?
इन विश्वासों के गीतों की ,
जाने क्यों टूटी है हर लय?
अपनों ने इतना छला कि अब ,
अपने पन से लगता है भय ,
मेरे मानस   के राजभवन का ,
रोज यही तो किस्सा है ,
जिसका किंचित भी अंश नहीं ,
उसका ही पूरा हिस्सा है //

2 टिप्‍पणियां:

  1. कविता अच्छी लगी.सर,मेरे पास आपका नं.नहीं है.इधर उधर आने-जाने में कहीं खो गया.आपसे बात हुए काफ़ी समय हो गया.याद आती रहती है.

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  2. apke blog me jo revolver map aa raha hai uski wajah se post nahi padhi ja rahi wo post ke upar hai..

    उत्तर देंहटाएं

© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.