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ग़ज़ल 
दर्द उतरा है सरेशाम मेरी बस्ती में ,
अपने ही कर रहे हैं छेद अपनी कश्ती में ,
उम्र पर पाबंदियां ढीली हुई हैं आज तो ,
वक़्त की रंगीनियों मे लोग सारे मस्ती में ,
जल रहा है देश तो क्या अपना घर महफूज है ,
जोश है पर होश का क्या ,बचा कुछ क्या हस्ती में ?
छल रही है  रौशनी जब तम हुआ राजा यहाँ ,
मौन है जब सत्य तो संकल्प भी है पस्ती में ,

4 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय भूपेंद्र जी,
    रुसवाईयो से कंही दूर और भी बहुत कुछ है बांकी , मै ये नहीं कहता की दुनिया में हम केवल इन्शान बनाने ही और खुशियों को बटोरने ही आये है , भतेरे लोग है जो जिंदगी के कुछ पल भी नहीं जी पाते जो जी नहीं पाते वो भी हंसाने की चाहत पाले पाले मर भी जाते है लिहाजा आप से दरखास्त है की उनके लिए ही सही गीत ख़ुशी का ही लिखे /
    बेहतर पोस्ट के लिए मुबारकबाद !

    उत्तर देंहटाएं
  2. Nice, really very nice.
    want to see u in touch always.
    come to my blogs of ghazals.

    उत्तर देंहटाएं

© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.