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कविता

तन जलता है ,मन जलता है ,
खुद में एक सूरज पलता है ,
अपनी बात न कह पाए हम ,
यही हमारी  असफलता है ,


उम्मीदों के चन्दन वन में ,
नेह भरे उज्जवल दर्पण में ,
कहाँ गए अपने से चेहरे ?
जीवन के निर्णायक क्षण मे ,


सुबह शाम के रंग खो गए ,
सपने भी थे जगे,सो गए ,
किससे कुशल क्षेम पूछोगे ?
जबकि स्वजन सब विदा होगये ,


बूढी,थकी उम्मीदें घर की,
चूती,उजड़ी छत  छप्पर की ,
पूँछ रही क्या लौट सकोगे?
रात बची है एक प्रहर की ,

14 टिप्‍पणियां:

  1. भूपेन्द्र जी, कविता के भावों में अपनापन है। बधाई स्वीकारें।
    --------
    सावन आया, तरह-तरह के साँप ही नहीं पाँच फन वाला नाग भी लाया।

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  2. I liked your poems. what is your opinion about the lyrics of the song 'Rajini Gandha phool tumhare......particularly the line........itna sukh hai Bandhan me......I mean amazing lines.....I don't know who wrote it but fantastic one>>>

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  3. बूढी,थकी उम्मीदें घर की,
    चूती,उजड़ी छत छप्पर की ,
    पूँछ रही क्या लौट सकोगे?
    रात बची है एक प्रहर की ,

    exceelent creation

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सर्वप्रथम आपके द्वारा मुँशी प्रेमचंद जी पर की गयी प्रतिक्रिया पर आपका शुक्रिया.....

    "तन जलता है ,मन जलता है ,
    खुद में एक सूरज पलता है ,
    अपनी बात न कह पाए हम ,
    यह अपनी ही असफलता है ,"

    ये बहुत सुन्दर पंक्तियाँ लिखी है आपने ....

    मेरे ब्लॉग के लिंक हैं :-


    http://jazbaattheemotions.blogspot.com/
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    http://khaleelzibran.blogspot.com/
    http://qalamkasipahi.blogspot.com/

    कृपया फॉलो करके उत्साह बढ़ाये ......धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. भूपेन्द्र जी! आपके ब्लाग पर आ कर प्रसन्नता हुई।
    उम्मीदों के चन्दन वन में।
    नेह भरे उज्जवल दर्पण में॥
    कहाँ गए अपने से चेहरे ?
    जीवन के निर्णयक क्षण में॥
    ......................
    सुबह - शाम के रंग खो गए।
    सपन - सजीले, जगे; सो गए॥
    किससे कुशल - क्षेम पूछोगे ?
    जबकि स्वजन सब विदा हो गये॥
    .......................
    तन जलता है, मन जलता है।
    ख़ुद में एक सूर्य पलता है॥
    अपनी बात न कह पाए हम-
    यही हमारी असफलता है॥
    -----------------------

    भावों को बिना छेड़े कु्छ पदों को मैंने परिवर्तित किया। अगर संशोधन पसंद आए तो उसे सहेज लेना।
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

    उत्तर देंहटाएं
  7. बूढी,थकी उम्मीदें घर की,
    चूती,उजड़ी छत छप्पर की ,
    पूँछ रही क्या लौट सकोगे?
    रात बची है एक प्रहर की ,

    bahut sunder .....!!

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  8. संघर्ष और जीवन के ऊहापोह को व्यक्त करती ये पंक्तियां हममें से अधिकतर की कथा-व्यथा है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. ,सुबह शाम के रंग खो गए ,
    सपने भी थे जगे,सो गए ,
    किससे कुशल क्षेम पूछोगे ?
    जबकि स्वजन सब विदा होगये ,!! बहुत हृदय ग्राही कविता देकर आपने तो रुला ही दिया ! आभार !

    उत्तर देंहटाएं

© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.