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ग़ज़ल

हवाओं  के  उलटे ही हम बोलते हैं /
उडने के पहले ही पर तौलते हैं//
रही जंगलों में है रहने की आदत/
मगर  मन में इसको ही घर बोलते हैं//
अंधेरों में काफी है नन्हा   दिया भी /
वे अंधों को रोशन नज़र बोलते हैं//
दरवाज़े  दिल के हैं  बन्द इसलिए बस /
मेरे  हमसफ़र इस  कदर बोलते हैं//

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© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.