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by 5:56 am
घुटन है बेहद ये खिड़की खोल तोदो ,  फेंकते हो जाल क्यों ?कुछ बोल तो दो / संधियों से छन रही है रोशनी , पाल जैसी तन रही है रौशनी , पतंगें ...Read More

मैं

by 6:56 am
इस तरह से जिया, मैं मरा/ जिंदगी में  नहीं है त्वरा // तप रहा और ज्यादा गगन / निर्जला हो रही है धरा  // रोशनी हारने लग पड़ी / लग रहा है अँधे...Read More
© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.