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गीत

 संघर्षों को बना लिया है जब मन के अनुरूप ,
फिर क्यों भला बताओ लिख दें अन्धकार को धूप? ,
चन्दन के वन खोजे तो सापों के दंश मिले           ,
मर्यादा चाही   फिर भी         रावण के वंश मिले
जीवन की इस भाग दौड़ में बैसाखी सपनों की ,
अपने में इतना डूबे कब याद करें अपनों  की ,

अपना मन खोया खोया पर दुनिया खोज रहे है ,
हैं तो हम याचक पर मन से राजा भोज रहे हैं ,                                        
कितना भी टूटें पर हरदम सब से जुड़े रहें है ,
पीले पड़ते पन्नो पर कविता सा मुड़े हुए हैं ,
यूं तो अपनी कविता के उपमान बहुत हैं बासी ,
फिर भी नहीं छुपाये छुपती अपनी घनी उदासी ,
जीर्ण शीर्ण पन्नों पर जीवन के लिख आये रूप,
जो भी होगा ,जैसे होगा सब अपने अनुरूप //

3 टिप्‍पणियां:

  1. कितना भी टूटें पर हरदम सब से जुड़े रहें है ,
    पीले पड़ते पन्नो पर कविता सा मुड़े हुए हैं ,
    waah jabardast.ek sunderr rachana

    उत्तर देंहटाएं
  2. जीवन की इस भाग दौड़ में बैसाखी सपनों की ,
    अपने में इतना डूबे कब याद करें अपनों की ,

    अपना मन खोया खोया पर दुनिया खोज रहे है ,

    इतना सुन्दर गीत कहाँ छुपा रखा था , लगता है सीधे मन के कोने से ही उतारकर रख दिया है , एकदम कोरा !
    मन को गहराई तक छू जाने वाली एक भावभीनी रचना ! बहुत खूब भूपेन्द्र जी ,लेकिन अपने में इतना न डूबें कि अपनों की भी याद न रहे !

    उत्तर देंहटाएं

© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.