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तुम्हारे हाथों पर ........

तुम्हारे हाथों पर मेहंदी सरीखा  रच गया मै ,
सच कहूं कल के लिए फिर बच गया मै ,
खोजता था रौशनी जो मिल न पाई,
छू सके जो मन ,कली वो खिल न पाई ,
किसके लिए खोजूं सितारों का गगन ?
आदमी जब है दीयों में ही मगन ,
तुम नहीं सुनते कहूं क्या ,क्यों कहूं? 
इससे अच्छा जैसे हूँ वैसे रहूँ ,
दूर तक कोई ओट             भी दिखती नहीं ,
भाग्य की  लिपि कुछ नया लिखती नहीं ,
थक गया हूँ मै समय के श्राप से ,
जी रहा हूँ आसरे  बस आपके ,
इस लिए तुम सूर्य से चलते रहो ,
मेरी तरह ही स्वयं को छलते  रहो //

4 टिप्‍पणियां:

  1. DR saheb, bahut hi utkrist rachna hai. aise srijan ko salam. koi achhi kavita padhne ko milti hai to dil ko sukoon milta hai.main pahli baar hi aapke blog par aaya hun. aap bhi mere blog par visit kar sakte hain www.shreekantparashar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. तुम्हारे हाथों पर मेहंदी सरीखा रच गया मै ,
    सच कहूं कल के लिए फिर बच गया मै ,..awesome....

    उत्तर देंहटाएं
  3. तुम्हारे हाथों पर मेहंदी सरीखा रच गया मै ,
    सच कहूं कल के लिए फिर बच गया मै ,

    मुझे ये कड़ी समझ में नहीं आई दोस्त...
    अच्छा लिखा है आपने...उम्दा. जारी रहें.
    --

    अंतिम पढ़ाव पर- हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

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