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गीत

एक सागर की कथा  है ,
जिंदगी मुझमे व्यथा है //
बह रहा हूँ धार सा मै  ,
जूझता मंझधार सा मै ,
घूमता फिरता रहा हूँ ,
हवा में तिरता रहा हूँ ,
मन की पाती पर लिखा 
जाने कहाँ ,किसका पता हूँ ?
ऊबता दिनरात हूँ मै ,
थकित झंझा वात हूँ मै ,
समर में विद्रोह को उठता
अकेला हाथ हूँ मैं ,
जो सदा संघर्ष मे है ,
शास्त्र क्यों फिर सौंपता है ?

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर !

    आखीरी पंक्तियाँ फानी दुनिया की दोहरी बेवफाई के मर्म को ब्यान करती है जो शायद हर किसी की हाले-गम है /

    कविता तो बहूत पसंद आई मगर गीत तो ख़ुशी के ही गाने अच्छे लगते है / मेरी मांग है आपसे की एक गीत वो भी लिखे जो गमो से दूर खुशियों की वादियों में गुनगुनाया जाता हो / थैंक्स/

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  2. भूपेन्द्र जी ,

    हाउ आर यूं सर , इधर से गुजर रहा था सोचा आपके भी हाल समाचार लेता चलू पर यंहा ना तो आप मिले और ना ही आपकी कोई ''कविता '' बिलकूल सन्नाटा था / उम्मीद है जल्द ही आप कोई मचलती और फडकती सी चीज हम मरे जा रहे पाठको के लिए प्रस्तुत करेंगे /थैंक्स/

    उत्तर देंहटाएं
  3. happy new year 2010 for you and your other family, i prey god ganpati to confer you whatever you wish for.
    a lull is spreading over from one to another posting that sting me so much ragingly that seems to me its being beyond of tolerance.
    i have kept a lots for next time.
    thanks.

    उत्तर देंहटाएं

© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.