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गीत

छोटी सी इक किरण से आकाश ने कहा,
तुम खिल कर बिखरती हो पर मै थमा रहा ,
ओंठो पर मुस्कुराहटें कितनी ही आ गयीं ,
पहले किरण हंसी फिर थोडा लजा गयी ,

आपमे विस्तार है ,गहरे है ,धमक  है ,
पर क्या प्यार से जुडने की आँखों मे चमक है ?
युग युग से  तो  थमे हो पर कुछ भार नहीं तुम मे ,
अपनाने को किसी का अधिकार नहीं तुममे ,

क्षण भर को मै जगी हूँ पर तिमिर तो है हारा,
जो स्नेह बाँट ती हो बहती वही है धारा
,क्या आना और जाना ,यह सब तो बस भरम है ,
खुद मिट के दे उजाले यह देह का धरम है ,

बस ,इस लिए खड़ी हूँ ,यूं आपसे बड़ी हूँ /
चाहो तो किरण कह लो ,वरना तो फुलझड़ी हूँ //





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3 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय डाक्टर साब,

    बड़ी प्यारी रचना अंकित की है आपने , बधाई !

    मै लम्बे समय से आपके ब्लॉग पर नहीं आ पाया , परन्तु आयन्दा ये नहीं होगा यह मेरा प्रोमिश है /

    थैंक्स/

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर तुलना , बहुत कुछ कह जाती हुई |
    ज्यादा चीजें लोड करने की वजह से ब्लॉग खोलने में परेशानी हुई , देर लगी |

    उत्तर देंहटाएं

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