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गीत

देखो चन्दन वन बहक  गया ,
जाने कितना कुछ महक गया ,
अंगड़ाई ली अभिसारों ने ,
मादक परिणय व्यापारों ने ,
फुनगी पर चढ़ा पलाश यहाँ ,
पिघले लोहे सा दहक गया //देखो ......
छूटी पीछे बीती पीड़ा ,
श्वांसों ने छेड़ी है वीणा ,
जागे जीवन मे राग नए ,
भोला मन फिर से लहक गया //देखो ......
करलीं तुमसे कितनी बातें ,
संग-संग जागे कितनी रातें ,
स्मृतियों का यह अमर दीप ,
फिर जाने कैसे ढरक गया //देखो ............
मुझसे ,कुछ भी प्रिय बोलो तो ,
अपना अंतर कुछ खोलो तो ,
तुमसे मिल कर रुक गया समय ,
प्राणों का पंछी चहक गया //देखो .................

6 टिप्‍पणियां:

  1. जनाब,

    भूल सुधार की मुराद लेकर हाजरी दर्ज करवा रहा हूँ उम्मीद है ज्यादा नाराज नहीं हुए होंगे आप क्यों कि लम्बे समय से इधर आना नहीं हुआ जब कि आपने पूरे फराकदिली से मेरे मर्जी गीत भी यंहा सजाया हुआ है /
    आपको दो मर्तवा शुक्रिया अदा करूंगा आज , पहला तो इस लिए कि एक असंभव-सा अद्भूत गीत रचा दूसरे ख़ुशी का गीत रचने के लिए / शुक्रिया !शुक्रिया !

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  2. बेजोड़ शब्द और भाव लिए अप्रतिम रचना...बधाई
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  3. पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और प्रोत्साहन भरा टिपण्णी देने के लिए !
    मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रचना लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी सभी रचनाएँ बहुत सुंदर हैं.

    उत्तर देंहटाएं

© डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह. Blogger द्वारा संचालित.